Wednesday, 5 September 2018

मोहन और अरुण की कहानी - Real Life Inspirational Stories in Hindi


Real Life Inspirational Stories in Hindi 


एक छोटा सा गाँव था। उस गाँव में दो दोस्त रहते थे। एक का नाम था अरुण और दूसरे का नाम था मोहन, अरुण के पिता एक कपड़े के व्यापारी थे, गाँव के लोगों के बीच उनका अच्छा सम्मान था। अपने पिता को देख उनका बेटा अरुण भी पढाई से अधिक पैसा को महत्व देता था।

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मोहन के पिताजी एक किसान थे, वे गाँव में खेती करते थे, अपने पिता की तरह मोहन ईमानदारी और परिश्रम को अधिक महत्वपूर्ण मानता था।

कुछ साल बाद...मोहन को आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाना था, मोहन के अपने दोस्त अरुण से भी शहर चलने को कहा।

अब मोहन को अकेले ही शहर जाना पड़ा।

इधर अरुण ने कपड़े का व्यापार में अपना समय देने लगा।

इसी तरह कुछ वर्ष बीत गए, अब मोहन की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, और उसे एक कंपनी में नौकरी मिल गयी।

इधर अरुण को व्यापार में नुकसान होता रहा, उसे ना तो समय पर किसीसे पैसा मिलता था और ना ही वह किसी को पैसा दे पाता था।

अरुण के पिता ने उससे कहा : बेटा अब व्यापार को बंद हो चुका हैं। अब तुम यहाँ रहकर कुछ कर नहीं रहे हो।

इसलिए तुम शहर चले जाओ, वहाँ कोई नौकरी ढूंढ़ना जब कुछ पैसा मिल जाये तब फिर से व्यापार के बारें में सोचेंगे।

अरुण अब शहर चला जाता हैं। उसने नौकरी के लिए बहुत जगह आवेदन दिया लेकिन शहर में उसे कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी।

बहुत कोशिश करने के बाद फिर एक दिन उसे एक कंपनी में इंटरव्यू के लिये बुलाया गया।

अरुण अगले ही दिन कंपनी में इंटरव्यू देने गया, उसे इंटरव्यू के लिये मैनेजर ने अपने ऑफिस में अंदर बुलाया।

आज अरुण का पहला इंटरव्यू था, उसे अंदर से बहुत संकोच हो रहा था।

कुछ देर बाद वह मैनेजर के ऑफिस के अंदर दाखिल हुआ। मैनेजर एक बड़ी सी कुर्सी पर बैठा हुआ था। सामने एक कंप्यूटर भी रखा था।

मैनेजर ने अरुण से कहा : मुझे पता चला हैं कि आप बहुत दिन से नौकरी की तलाश में थे।

अरुण : जी सर।




मैनेजर : अच्छा लेकिन आप नौकरी क्यों ढूंढ़ रहे हैं। मुझे बताया गया हैं कि आपका अपना कपड़ों का व्यापार था।

अरुण का पहला इंटरव्यू था। मैनेजर के इस सवाल पर वह भावुक हो गया। उसने कहा : जी सर मेरा अपना एक छोटा सा व्यापार था।

लेकिन जब मेरे पिताजी ने मुझे व्यापार सौंपा तो मुझे उसकी कुछ खास जानकारी नहीं थी।

मेरे अंदर बहुत अधिक घमण्ड था, जिसके कारण मेरे सभी ग्राहकों ने मेरे साथ खरीदारी करने बंद कर दिया।

में जिससे कपड़ा खरीदता था, वह भी अब उधार देने से मना कर रहा था। दरअसल मेरे अंदर बचपन से ही यह घमण्ड था। 

मैनेजर भी उसकी बातों को चुपचाप सुन रहा था। उसे बहुत दिन दिन बाद कोई ऐसा व्यक्ति मिला था।

बचपन में मेरा एक दोस्त था, उसका नाम था मोहन वह भी मेरे ही साथ पढ़ाई करता था। वह शिक्षा को बहुत महत्व देता था।

जब भी स्कूल में छूट्टी रहती थी, वो पढ़ाई करता और में सारा दिन घूमने में बीतता था। आज वह भी इसी शहर में रहता हैं, वह अच्छी नौकरी कर रहा हैं।

मैनेजर : तब आपको उसके पास जाना चाहिये था, वह नौकरी ढूंढने में आपकी मदद कर सकता है।

अरुण ने कहा : नहीं अब में उससे बात नहीं सकता क्यों कि जब उसने मुझे शहर में पढ़ाई करने के लिये कहा था तब मैंने उसका मजाक बनाया था।


यह सुन मैनेजर का चेहरा बदल गया। वह अपनी कुर्शी से उठा और उसने अरुण को गले गया लिया।

मैनेजर : अरे पगले, बस इतनी सी बात के लिये, तू मुझसे बात करना छोड़ देगा। में वही तेरा बचपन का दोस्त मोहन हूँ।

मोहन (मैनेजर) ने भावुक स्वर में कहा : जब में पिछले साल गांव गया तो तुझसे मिलने गया था। लेकिन तेरे पिताजी ने मुझे बताया कि तू व्यापार के काम से बाहर गया हैं। 

अरुण (उदास होकर) : नहीं दोस्त, उस दिन में गांव में ही था। मेरे घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। में तेरा स्वागत नहीं कर सकता था। इसलिये मेरे पिताजी ने तुम्हें ऐसा कहा था।

मोहन : चल दोस्त घर पर चलते हैं। वहीं आराम से बात करेंगे, आज में छूट्टी ले लेता हूँ।

उसके बाद मोहन ने अरुण को अपने कंपनी में नौकरी पर नहीं रखा बल्कि उसे व्यापार करना सिखाया, उसे व्यापार के बारे में जानकारी दिया।

अब अरुण व्यापार के बारे में सबकुछ समझ गया था, वह वापस गांव आ गया उसने पैसा इकट्ठा किया और दोबारा कपड़े का व्यापार शुरू किया।

इसबार उसका व्यापार बहुत सफल हुआ। वह एक अच्छा व्यापारी बन गया। अब वह शिक्षा का महत्व समझ गया था।

*****

दोस्तों, मोहन अपने दोस्त के लिये मैनेजर बना था। असल में वह उसकी ही कंपनी थी, वह उस कंपनी का मालिक था।


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