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Wednesday, 22 August 2018

साहसी बालक की कहानी - (Sahasi Balak ki Kahani)

पूर्णचन्द्र नाम का एक बालक था। वो प्रतिदिन अपने गाँव की पाठशाला में पढ़ने जाया करता था।

उसे पढ़ने लिखने का बहुत शौक था, वो पाठशाला से आकर थोड़ा खेलता और फिर पढ़ने बैठ जाता था।

sahasi balak ki kahani
साहसी बालक की कहानी

एक दिन की बात हैं, पूर्णचन्द्र पाठशाला से आकर खेलते-खेलते थक गया था। उसने थोड़ा खाना खाया फिर चारपायी पर लेट गया।

वह थका तो था ही उसे जल्दी ही गहरी नींद आ गयी, नींद में उसे कुछ लोगों के भागने और चिल्लाने की आवाज सुनाई दी।

पूर्णचन्द्र घबराकर उठ गया, उसने देखा कि सचमुच लोग भाग रहे थे, उसके गाँव में आग लग गयी थी।

आग पूरे गाँव में फैल चुकी थी, पूर्णचन्द्र के विद्यालय के नजदीक के झोपड़ी में भी आग लगी हुयी थी।

इतने में एक जलती हुई लकड़ी विद्यालय के ऊपर गिरी, पाठशाला का दरबाजा बन्द था, उसपर ताला लगा हुआ था।

पूर्णचन्द्र ने कुछ सोचा और वह एक बांस के सहारे पाठशाला की छत पर चढ़ गया, पाठशाला की छत फुस की थी।

लेकिन छत में आग पकड़ती उससे पहले ही पूर्णचन्द्र ने जलती लकड़ी नीचे फेंक दिया।

लोगों ने जब एक बालक को इस तरह से अपने पाठशाला की सुरक्षा करते देखा तो वो भी भागना छोड़ आग बुझाने में जुट गये।

और इस तरह पूरे गाँव के लोग इधर-उधर भागना छोड़कर आग पर पानी डालने लगे, इसके कारण कुछ ही समय पूरी आग बुझ गयी।

इस तरह एक साहसी बालक के कारण पूरा गाँव जलने से बच गया, गाँव के लोगों ने पूर्णचन्द्र की तारीफ की, उसे पाठशाला की तरफ से इनाम मिला।

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