Tuesday, 31 July 2018

सास बहू की लड़ाई एक अनोखी कहानी - Saas Bahu Ki Ladai


सुनंदा अपने पिता की इकलौती बेटी थी, नाम के मुताबिक  देखने में भी बहुत सुन्दर थी। जब वह अपने ससुराल गयी तो  उसे उसके मुताबिक ही सब कुछ मिला।
किन्तु आज कल की लड़कियों को अधिक टोकना, समझाना अपने मन के मुताबिक चलाना सासू माँ को अब कहाँ रह गया हैं। 

saas bahu ki ladai
image by - Saas Bahu
एक कहावत तो आपके सुनी ही होगी, जो किया बहू से टकरार, खो दिया उसने बेटे का प्यार।
इस कहानी के मुताबिक सुनंदा की सास सुनंदा को हमेशा समझाती बहू ऐसा करो, ऐसा न करो, नई नवेली बहू को थोड़े  ही दिनों में अपनी सासू माँ से चिढ़ पैदा होने लगी।

इस प्रकार यह सिलसिला आगे की ओर बढ़ता गया, एक दिन सुनंदा के घर कुछ मेहमान आने वाले थे, सासू माँ बोली बहू - आज कुछ अच्छी अच्छी व्यंजन बनाओ और मेहमानों के लिये चाय नास्ता का इंतजाम भी अच्छी तरह से होनी चाहिये।
बस अब क्या था, इतना सुनते ही सुनंदा गुस्से से लाल हो गयी, उसने जल-भून कर उस दिन तो काम किया लेकिन,  उस दिन के बाद सुनंदा ने चाल - चलना शुरू किया, सास जैसा कहती, वह ठीक उसके विपरीत करती थी।
सास ने भी पुरानी कहावत के मुताबिक बहू को उसके माता-पिता को गाली देना उसे कोसना और बड़बड़ाना शुरू कर दिया।
दोनों सास बहू में आना कानी हमेशा चलता रहता था, एक दिन सुनंदा अपने पिता के घर रोती पिटती पहुँच गई।

वह अपने पिता से बोली - पिताजी....आप तो डॉक्टर हो मुझे कुछ ऐसी दवा दीजिये, जिसे खिलाकर वह बुढ़िया गूँगी हो जाये, क्योंकि वह मुझे गन्दी – गन्दी  गलियां  देती हैं। 
इस पर पिताजी कुछ सोंचते हुए बोले - बेटी मेरे पास एक ऐसी दवा हैं, लेकिन यह कड़वा हैं, वो आसानी से नहीं खाएगी, इसलिये मैंने एक युक्ती सोंची हैं, तुम हर रोज, एक महीने तक यह दवा अपनी सास को खाना में मिलाकर खिलाती रहना, ठीक एक महीने में वह पूरी तरह गूँगी हो जाएगी।
लेकिन हाँ यह दवा थोड़ा कड़वा हैं, इसलिए तुम खाना इतना प्यार से खिलाना की उसे पता ही ना चले।
दवा लेकर सुनंदा ख़ुशी – ख़ुशी अपने घर आयी, और पिता के कहे मुताबिक अपना काम शुरू कर दी।
अब सास जो कुछ भी कहती उसे वह मानती और उलट कर जवाब भी नहीं देती क्योंकि वह जानती थी, कि बुढ़िया तो अब महीनें भर में गूँगी होने वाली हैं, बोल ले जितना बोलना हैं।
उसके बाद वह चैन से रहेंगी, अब हर रोज वह प्यार से चुटकी भर दवा खाना में मिलाकर प्यार से माँ जी को देती थी।
माँ भी समझती शायद इसके माता-पिता ने इसे समझाया बुझाया हैं। इस लिये यह लड़ना झगड़ना बन्द कर दी हैं। 
अब माँ जी भी बहू की खुब प्रसन्नसा किया करती थी, और बहू भी प्रसन्नसा सुन कर प्यार बातें किया करती थी। अगर बहु से कुछ गलती भी जाती तो भी 
इस प्रकार महीना आते आते दोनों सास बहू में इतना प्यार बढ़ गया की बहू अब अपनी सास की आवाज को खोना नहीं चाहती थी।
एक दिन फिर उसी प्रकार सुनंदा रोती पिटती अपने पिता के पास पहुंची।

पिता जी बोले अब क्या  हुआ, सुनंदा बोली - पिताजी अब क्या होगा, मेरी सास बहुत अच्छी हैं, में उसकी आवाज खोना नहीं चाहती, वह मुझसे प्यार से बात करती है।
अब मुझे कोई ऐसी दवा दीजिये जो की मेरी माँ जी को दिया हुआ दवाई का असर काट सके और वह गूँगी ना हो पाए।
इस पर पिताजी हँसते हुए बोले बेटी तुम रोना धोना बंद करो और ख़ुशी से रहो।

जो दवा मैने तुम्हे दिया वह कोई दवाई नहीं था, वह रिश्तों में घुली कड़वाहट उतरने की तरकीब थी। अगर में ऐसा नहीं  किया होता तो तुम शायद आज नहीं सुधारी होती।
बेटी इसी प्रकार यदि तुम अपनी सास के साथ अच्छे से रहोगी तो वह भी  तुम्हें अपनी बेटी के सामान प्यार करेगी।

अब सुनंदा को सारी बातें समझ में आ गयी थी, उसे अपनी गलती का ऐहसास भी हो गया था। वह वापस अपने ससुराल चली आयी।

इसके बाद दोनों सास बहू प्यार से रहने लगी, उनके बीच स्नेह और अपनापन का भाव आ गया और घर खुशियों से भर गया। 
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आशा हैं की ये कहानी आपके दिल को छू गयी होगी। यह एक सच्चाई हैं, अगर बहु अपने सास का प्यार पाना चाहती हैं, तो उसे भी अपने सास को स्नेह देना होगा। जिस घर में सास बहू में स्नेह होता हैं, वहाँ हमेशा खुशियाँ आती हैं।
अंत में बस इतना ही इस कहानी को एक शेयर जरूर करिये, बस समझने की देर हैं, इस कहानी से कितने ही लोगों के जिंदगी में खुशियाँ आ सकती हैं।
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