Wednesday, 4 July 2018

ईश्वर चंद्र विद्यासागर की कहानी - ishwar chandra vidyasagar story in hindi

एक छोटा सा स्टेशन था, बहुत कम रेलगाड़ी ही वहाँ रुकती थी। शाम का समय था, अंधेरा हो रहा था। चारों ओर चिड़ियाँ चहक रहीं थी, उसी समय एक रेलगाड़ी छुक - छुक करती हुयी वहाँ रुकती हैं।

Ishwar chandra vidhya sagar

रेलगाड़ी से एक व्यक्ति हाथ में अपना सुटकेश लिए बाहर निकलते हैं।

उस व्यक्ति का नाम था मनमोहन, वो स्टेशन पर खड़े होकर कुली को आवाज लगाने लगा।

लेकिन वहाँ आसपास कोई भी नजर नहीं आ रहा था, तभी स्टेशन मास्टर जी हाथ में लालटेन लेकर आये।

उन्होंने मनमोहन से कहा : यहाँ कोई कुली नहीं हैं, यहाँ बहुत कम गाड़ी रुकती हैं। 

मास्टर ही इतना कह ही रहे थे तभी उनकी ओर एक व्यक्ति आया उसने मनमोहन का सुटकेश अपने कंधे पर रख लिया और कहा : आपको कहाँ जाना हैं चलिए।


स्टेशन मास्टर जी बहुत हैरान हुए वे कुछ कहने ही वाले थे तभी वह व्यक्ति कंधे पर सूटकेस लिए उन्हें इशारा कर देता हैं।


मनमोहन स्टेशन से बाहर निकले तो उस व्यक्ति ने पूछा : आपको कहाँ जाना हैं, साहब?

मनमोहन : मुझे ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी से मिलना हैं, सुना हैं उनका घर नजदीक ही हैं।

व्यक्ति : जी आपने ठीक कहा, चलिए में आपको ले चलता हूँ।

कुछ देर मनमोहन उस व्यक्ति के साथ चलते गये, वो व्यक्ति उन्हें रास्ते में स्टेशन और जगह के बारें में बताता गया, इस तरह रास्ता कैसे बीत गया कुछ पता नहीं चला।

वे ईश्वर चंद्र विद्यासागर के घर पहुँच गए, उस व्यक्ति ने हाथ पैर धोने के लिए पानी दिया और बैठने के लिए कुर्सी लेकर आये, मनमोहन हाथ पैर धोकर बैठे फिर उस व्यक्ति ने कहा : जी मनमोहन जी कहिये, में ईश्वर चंद्र विद्यासागर हूँ।

मनमोहन ने उनकी सादगी के बारे में सुना तो था, लेकिन आज मनमोहन से रहा नहीं गया, उसने ईश्वर चंद्र विद्यासागर के चरण पकड़ लिए, विद्यासागर ने मनमोहन को उठाया और गले से लगा लिया।

ऐसे थे समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर, सादगी से रहने वाले और समाज के लिए हमेशा अच्छा सोचने वाले व्यक्ति इसलिए लोग आज भी उन्हें याद करते हैं।

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