Vikram Aur Betal - सैनिक वीरवर की परीक्षा


Vikram Aur Betal - सैनिक वीरवर की परीक्षा


विक्रम बेताल की दूसरी कहानी

एक समय की बात हैं । बर्धमान नगर का राजा रूपसेन बड़ा ही प्रतापी था। राजा ने अपनी सुरक्षा में एक अंगरक्षक नियुक्त किया था. जिसका नाम था वीरवर। 
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Vikram aur betaal

वीरवर दिन रात राजा की सुरक्षा करता था। लेकिन इसके बदले वो राजा से नौ घड़ा सोना प्रतिमाह वेतन लेता था।

एक अंगरक्षक को इतना सोना दिए जाने के कारण उस राज्य की राज्य लक्ष्मी को चिंता होने लगी। ये अंगरक्षक नौ घड़ा सोना वेतन पाने के योग्य हैं या नहीं इसलिए इसकी परीक्षा लेनी चाहिए।

रात में राजा जब सोने गया तो उसने एक औरत के रोने की आवाज सुनी। राजा ने वीरवर से कहा - तुम जरा देखकर आओ की ये कौन हैं जो इतनी रात को रो रही हैं।

अंगरक्षक वीरवर राजा की आज्ञा से निकल पड़ा। उसने देखा कि एक पेड़ के नीचे एक औरत रो रही हैं। वीरवर के पूछने पर उसने बताया कि - " मैं इस राज्य की राज्य लक्ष्मी हूँ, इस राज्य पर संकट आ गया हैं। यहाँ का काल देवता तुम्हारे राजा से नाराज हैं , वो कल सुबह उसे निगल जाएगा"

अंगरक्षक वीरवर ने कहा - माँ अगर कोई उपाय हो तो बताओ में राजा का सेवक हूँ। मेरा कर्तव्य हैं कि में अपने राजा की सेवा करूँ।

राज्य लक्ष्मी ने कहा - अगर तुम आज रात ही उस काल देवता की भूख मिटा सको तो कल सुबह उसका गुस्सा ठंडा हो जाएगा। वह राजा को नहीं मरेगा। तुम उत्तर की दिशा में जाओ तुम्हें वो काल देवता मिल जाएगा।

वीरवर कुछ ही दूर उस दिशा में गया कि उसे वह काल देवता मिल गए। वीरवर ने काल देवता से कहा - आप मुझे अपना भोजन बना लीजिए में राजा का अंगरक्षक हूँ।

काल देवता ने कहा ठीक हैं। अगर तुम अपने राजा के लिए जान दे सकते हो तो में उसे नहीं मरूँगा।
और काल देवता उस वीरवर को निगल गये

जब वीरवर कुछ देर वापस नहीं आया तो राजा अकेले ही उसकी खोज में निकल गया। 
राजा को रास्ते में राज्य लक्ष्मी मिल गयी। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और पूछा - माँ मेरा एक सैनिक इस दिशा में आया था। क्या आपने उसे देखा हैं।

राज्य लक्ष्मी ने राजा को पूरी बात दी। राजा सुन कर बहुत दुखी हुआ। और राजा भी उस काल देवता के पास चला गया।

उसी दिशा में राजा को काल देवता मिल गए। अब राजा ने कहा - हे काल देवता आप मेरा भोजन करने वाले थे। आप मेरे काल बनकर आये हैं। इसलिए आप मुझे निगल लीजिये और वीरवर को वापस लौटा दीजिये.

काल देवता ने वीरवर को वापस लौटा दिया और राजा से कहा- में प्रसन्न हूँ। राजा तुम और तुम्हारा सेवक दोनों ने अपने कर्तव्य का पालन किया हैं। में काल देवता नहीं हुँ। ये राज्य लक्ष्मी की माया थी। वीरवर परीक्षा में सफल रहा। राज्य लक्ष्मी तुम पर प्रसन्न हैं।

इतनी कहानी सुनाने के बाद बेताल ने विक्रम से किया सवाल - "बता विक्रम त्याग किसका बड़ा महान कौन राजा या अंगरक्षक ?" बता नहीं तो तेरे सर के टुकड़े - टुकड़े कर डालूंगा।

विक्रम ने कहा - सुन बेताल अंगरक्षक का तो कर्तव्य बनता हैं कि अगर राजा के प्राण संकट में हो तो अपनी प्राण देकर भी उसकी रक्षा करे। लेकिन राजा ने वीरवर को अपना प्रजा समझ कर उसके लिए अपने प्राण का मोह छोड़ दिया इसलिए राजा का त्याग बड़ा राजा महान.

बेताल बोला - विक्रम जबाब तूने ठीक दिया। राजा महान राजा का त्याग बड़ा लेकिन मेरी दूसरी शर्त थी कि तू बोलेगा नहीं। अब तू बोला और में चला। बेताल वापस उस पेड़ पर जा लटका.

विक्रम फिर वापस उस खंडहर के पास गए। उन्होंने फिर से बेताल को अपने वश में किया और ले जाने लगे तो बेताल ने राजा विक्रम को तीसरी कहानी सुनाई

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