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Tuesday, 6 February 2018

कविता - हम पंछी उन्मुक्त गगन के | Heart Touching Poem

कविता - हम पंछी उन्मुक्त गगन के Heart Touching poem image
कविता

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरे बंद न रह पाएँगे 
कनक - तीलियों से टकराकर 
पुलकित पंख टूट जाएँगे |


हम बहता जल पीने वाले 
मर जाएँगे भूखे - प्यासे 
कहीं भली है कटुक निबोरी 
कनक कटोरी की मैदा से |

स्वर्ण श्रिंखला के बंधन में
अपनी गति उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरु की फुनगी पर के झूले |

ऐसे थे अरमान की उड़ते 
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण - सी चोंच खोल
चुगते तारक अनार के दाने |

होती सीमाहीन छितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो छितिज मिलन बन जाता 
या तनती सांसो की डोरी |

नीर न दो चाहे टहनी का 
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो 
लेकिन पंख दिए हैं तो 
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो |  
                                    -शिवमंगल सिंह सुमन


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